मुंशी प्रेमचंद्र (Munshi Premchand)

इस आर्टिकल में हम बात करने वाले हैं कलम के सिपाही Munshi Premchand के बारे में। उन्होंने अपनी लेखनी की शक्ति से समाज को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

Munshi Premchand ने अपने समय की कई सामाजिक कुरीतियों जैसे जातिवाद, बाल विवाह, गरीबी और शोषण पर खुलकर लेखन किया। उनकी रचनाओं में समाज की वास्तविकता और आम लोगों के संघर्ष का सजीव चित्रण मिलता है।

उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से समाज को जागरूक करने और बदलाव लाने का प्रयास किया, जिस कारण उन्हें हिंदी साहित्य के सबसे महान लेखकों में गिना जाता है।

About Munshi Premchand

जब भी किसी महान लेखक का नाम लिया जाता है, तो Munshi Premchand का नाम स्वतः ही सामने जाता है। उन्होंने अपनी लेखनी की ताकत से समाज में जागरूकता फैलाने और लोगों के भीतर आज़ादी की भावना को फिर से प्रज्वलित करने का कार्य किया।

Munshi Premchand ने अपने साहित्य के माध्यम से लोगों में एक नया जोश और सोच पैदा की। उनके लेखन में देशभक्ति, सामाजिक सुधार और मानवीय संवेदनाओं का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। उस समय की British Raj सरकार ने भी उनके विचारों को दबाने की कोशिश की, क्योंकि उनके लेख समाज को जागरूक और संगठित कर रहे थे।

हालाँकि कुछ बातें जैसे उनके हाथ कटवाने की योजना, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं मानी जातीं, लेकिन यह सच है कि उन्हें कई कठिनाइयों और विरोधों का सामना करना पड़ा।

अक्सर उनकी तुलना Rabindranath Tagore से की जाती है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सम्मान मिला। फिर भी हिंदी साहित्य में Munshi Premchand का स्थान सर्वोच्च माना जाता है।

आज के समय में भले ही कुछ लोग उन्हें कम याद करते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि उनके बिना हिंदी साहित्य का इतिहास अधूरा है। उनके उपन्यास और कहानियाँ आज भी स्कूलों और प्रतियोगी परीक्षाओं में पढ़ाई जाती हैं।

इस आर्टिकल में हम आपको Munshi Premchand की जीवनी, उनके साहित्यिक योगदान और उनकी प्रसिद्ध कहानियों के बारे में विस्तार से बताएंगे।

Munshi Premchand ka Jeevan parichay

विषय जानकारियों

नाम                                       मुंशी प्रेमचंद

बचपन का नाम                            धनपत राय

जन्म 31 जुलाई 1880

जन्म स्थल       वाराणसी के लमही गाँव मे 

मृत्यु 8 अक्टूबर 1936(56 वर्ष)

पिता अजायब राय

माता आनंदी देवी

शादी की तारीख  साल 1895 (पहली शादी)

                                साल 1906 (दूसरी शादी)

भाषा हिन्दी उर्दू

राष्ट्रीयता हिन्दुस्तानी

प्रमुख रचनाये गोदान, गबन

Munshi Premchand का जन्म 31 जुलाई 1880 को Varanasi के पास स्थित Lamhi गाँव में हुआ था। उनके पिता Ajaib Rai डाकखाने में क्लर्क थे और माता Anandi Devi थीं।

प्रेमचंद अपने परिवार की चौथी संतान थे। उनकी शुरुआती पारिवारिक स्थिति सामान्य और कुछ हद तक संपन्न थी, लेकिन उनका बचपन काफी संघर्षपूर्ण रहा। जब वे मात्र 8 वर्ष के थे, तब उनकी माता का एक गंभीर बीमारी के कारण निधन हो गया। कम उम्र में ही माँ का साया उठ जाने से उनका बचपन भावनात्मक रूप से बहुत कठिन हो गया।

माता के निधन के बाद उनकी देखभाल उनकी दादी ने की, लेकिन कुछ समय बाद उनका भी देहांत हो गया। उनकी बड़ी बहन की भी कम उम्र में शादी हो गई, जिससे Munshi Premchand घर में लगभग अकेले रह गए।

इसी दौरान उनके पिता का तबादला Gorakhpur हो गया और उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया। लेकिन सौतेली माँ से उन्हें वह स्नेह नहीं मिल पाया, जिसकी उन्हें आवश्यकता थी।

इन परिस्थितियों में Munshi Premchand ने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए पुस्तकों का सहारा लिया। यही वह समय था, जब उनका झुकाव साहित्य की ओर बढ़ा और आगे चलकर उन्होंने हिंदी साहित्य को अमूल्य योगदान दिया।

मुंशी प्रेमचंद का विवाह (Munshi Premchand Marriages)

उस समय समाज में कम उम्र में विवाह की परंपरा प्रचलित थी। इसी कारण Munshi Premchand का विवाह भी मात्र 15 वर्ष की आयु में, लगभग 1895 के आसपास, उनके पिता के दबाव में कर दिया गया।

युवावस्था में उन्हें एक लड़की से प्रेम भी हुआ था, लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण उस संबंध का विवाह में परिणत होना संभव नहीं हो सका। बाद में उन्होंने अपनी कुछ कहानियों में इस प्रकार की सामाजिक समस्याओं का चित्रण भी किया।

उनका पहला वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। उनकी पत्नी उनसे उम्र में बड़ी थीं और दोनों के स्वभाव में काफी अंतर था, जिससे उनके संबंधों में अक्सर तनाव बना रहता था। घर में सौतेली माँ और पत्नी के बीच भी मतभेद होते थे, जिससे Munshi Premchand मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगे।

अंततः परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उनकी पहली पत्नी उनसे अलग होकर अपने मायके चली गईं, और फिर वे उन्हें वापस लेने नहीं गए।

इसके बाद 1906 में Munshi Premchand ने Shivrani Devi से दूसरा विवाह किया, जो एक बालविधवा थीं। यह विवाह उनके जीवन में स्थिरता और सहयोग लेकर आया।

इस विवाह से उनके तीन संतान हुएShripat Rai, Amrit Rai और Kamala Devi Srivastava

इस प्रकार, Munshi Premchand का पारिवारिक जीवन कई उतारचढ़ावों से भरा रहा, जिसने उनके साहित्य को भी गहराई से प्रभावित किया।

शिक्षा (Munshi Premchand Education)

Munshi Premchand ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और फ़ारसी भाषाओं में प्राप्त की। बचपन से ही उन्हें पढ़नेलिखने का गहरा शौक था। मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ तिलिस्महोशरुबा पढ़ लिया था और कई उर्दू लेखकों के उपन्यासों का अध्ययन भी किया।

10वीं की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गई, जिससे उनका शिक्षण कार्य शुरू हुआ।

1910 में Munshi Premchand ने अंग्रेज़ी, दर्शन, फ़ारसी और इतिहास विषयों से इंटरमीडिएट पास किया। इसके बाद 1919 में उन्होंने University of Allahabad से अंग्रेज़ी, फ़ारसी और इतिहास विषयों के साथ बी.. की डिग्री प्राप्त की।

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर (निरीक्षक) के पद पर नियुक्त किया गया।

इस प्रकार, Munshi Premchand की शिक्षा और साहित्य के प्रति गहरी रुचि ने उनके भविष्य के महान लेखक बनने की मजबूत नींव तैयार की।

प्रेमचंद का संघर्ष (STRUGGLE )

कुछ ही समय बाद, 1897 में Munshi Premchand के पिता Ajaib Rai का निधन हो गया। इस घटना के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर गई।

अब उन्हें एक साथ अपनी पढ़ाई और घर की आर्थिक स्थितिदोनों संभालनी पड़ी। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने हार नहीं मानी और एक वकील के बेटे को ट्यूशन पढ़ाने का कार्य शुरू किया।

इस काम के लिए उन्हें मात्र 5 रुपये वेतन मिलता था, जिसमें से लगभग 60% राशि वे अपने घर भेज देते थे।

इस तरह कम उम्र में ही Munshi Premchand ने जिम्मेदारियों को निभाते हुए संघर्ष और आत्मनिर्भरता का परिचय दिया, जिसने उनके व्यक्तित्व और साहित्य को और भी मजबूत बनाया।

प्रेमचंद का वाराणसी में बिताया गया समय (Munshi premchand life in varanasi)

अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए Munshi Premchand Varanasi शहर गए। लेकिन इंटरमीडिएट में प्रथम श्रेणी (60%) से कम अंक होने के कारण उन्हें Banaras Hindu University में प्रवेश नहीं मिल सका।

घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए अपनी पढ़ाई रोकना ही उचित समझा और वहीं एक वकील के बच्चे को पढ़ाने का कार्य करने लगे। उस समय उनकी परिस्थितियाँ बहुत कठिन थींवे एक तबेले (गोशाला) में रहते थे और जीवन काफी संघर्षपूर्ण था।

फिर भी, Munshi Premchand का पढ़ने और लिखने का जुनून कभी कम नहीं हुआ। कठिन हालातों में भी उन्होंने अपने साहित्यिक रुचि को बनाए रखा।

जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाई और 1900 में उन्हें Bahraich में 20 रुपये मासिक वेतन पर सरकारी शिक्षक की नौकरी मिल गई।

इस प्रकार संघर्षों के बीच भी Munshi Premchand ने अपने जीवन को आगे बढ़ाया और अपने सपनों की दिशा में निरंतर प्रयास करते रहे।

साहित्य की ओर/ CAREER

Munshi Premchand ने Bahraich में रहते हुए गहन अध्ययन जारी रखा। इसी दौरान उनकी रुचि धीरेधीरे साहित्य लेखन की ओर बढ़ने लगी और उन्होंने निश्चय किया कि अब वे स्वयं भी लिखेंगे।

उनका तबादला क्रमशः Pratapgarh, Prayagraj (इलाहाबाद) और फिर Kanpur हुआ। कानपुर में उन्होंने 1905 से 1909 तक नौकरी की। यहीं उन्होंने अपनी पहली रचना Soz-e-Watan लिखनी शुरू की।

Soz-e-Watan का उद्देश्य लोगों में देशभक्ति की भावना जगाना था। इस पुस्तक का प्रभाव इतना गहरा था कि British Raj सरकार ने इसकी लगभग 500 प्रतियाँ जलाने का आदेश दिया और इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

इसके बाद Munshi Premchand Zamana नामक उर्दू पत्रिका से जुड़ गए। शुरुआत में वे उर्दू में लिखते थे, लेकिन बाद में उन्होंने हिंदी में भी लेखन शुरू किया।

1909 में उनकी पदोन्नति हुई और वे Gorakhpur गए। 1919 में स्नातक पूरा करने के बाद उन्हें स्कूल का डिप्टी इंस्पेक्टर बना दिया गया। लेकिन Mahatma Gandhi के Non-Cooperation Movement से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह साहित्य को समर्पित हो गए।

इसके बाद उन्होंने कई महान रचनाएँ लिखीं, जैसेGodaan, Nirmala, Do Bailon Ki Katha, Pratigya और Eidgah

नौकरी छोड़ने के बाद वे वापस Varanasi गए और 1923 मेंSaraswati Printing Pressकी स्थापना की, लेकिन यह व्यवसाय घाटे में चला गया। इसके बाद उन्होंनेJagranपत्रिका भी निकाली, जो सफल नहीं हो सकी।

इसी बीच उनका उपन्यास Gaban प्रकाशित हुआ, जो काफी लोकप्रिय रहा। फिर भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हो सकी और उन पर कर्ज बढ़ता गया।

आर्थिक कठिनाइयों से परेशान होकर अंततः Munshi Premchand ने Mumbai (तत्कालीन बंबई) जाने का निर्णय लिया, ताकि वे अपने जीवन और साहित्यिक करियर को नई दिशा दे सकें।

प्रेमचंद का मुंबई में बिताया गया समय (munshi premchand life in mumbai)

Munshi Premchand 31 मई 1934 को Mumbai (तत्कालीन बंबई) गए। वहाँ उन्हें फिल्म इंडस्ट्री (आज का Bollywood) में एक लेखक के रूप में लगभग 8000 रुपये वार्षिक वेतन पर नौकरी मिली। उन्हें लगा कि अब वे अपनी आर्थिक समस्याओं और कर्ज को आसानी से चुका पाएंगे।

मुंबई में उन्होंने अपनी पहली फिल्म Mazdoor लिखी, जो मजदूरों के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित थी। यह फिल्म सामाजिक और क्रांतिकारी विचारों से भरपूर थी।

जब यह फिल्म विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शित हुई, तो इसका असर इतना गहरा पड़ा कि मजदूर वर्ग प्रेरित होकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलित होने लगे। कई जगह मजदूरों ने धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया, जिससे कारखाना मालिकों और व्यापारियों में चिंता फैल गई।

इसी कारण फिल्म पर जल्दी ही रोक लगा दी गई।

इन परिस्थितियों और अपने स्वतंत्र स्वभाव के कारण Munshi Premchand को फिल्म इंडस्ट्री का वातावरण अनुकूल नहीं लगा। उन्हें रोकने के लिए कई प्रस्ताव दिए गए, लेकिन उन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

अंततः 1935 में उन्होंने Mumbai छोड़कर वापस लौटने का निर्णय लिया और पुनः साहित्य की दुनिया में पूरी तरह सक्रिय हो गए।

प्रेमचंद की मृत्यु (where was munshi premchand Died)

मुंबई से वाराणसी वापस आने के बाद इनका स्वास्थ्य निरन्तर बिगड़ता गया, और एक लम्बी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को दुनिया से अलविदा ले लिए। इनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले 1936 में ही इन्हे progressive writer association का अध्यक्ष बनाया गया था।

Munshi premchand ki rachnaye

मुंशी प्रेमचंद ने विभिन्न साहित्यिक रूपों में लिखा, सभी लोग उनकी रचनादृष्टि से काफी प्रेरित थे। प्रेमचंद एक विपुल लेखक थे। जिन्होंने कई अलगअलग शैलियों में उपन्यास, कहानियां, नाटक, समीक्षा, लेख, संपादकीय और संस्मरण लिखे। उन्हें मुख्य रूप से एक कथावाचक के रूप में जाना जाता था। उन्होंने 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बच्चों की किताबें, और हजारों पृष्ठों के लेख, संपादकीय, भाषण, पात्र, पत्र और भी बहुत कुछ लिखा है। मंगलसूत्र उनकी अधूरी (अपूर्ण) रचना है।

Munshi premchand ki kahaniya / stories

मुंशी प्रेमचंद द्वारा 300 से अधिक कहानियों रचना की गई थी। प्रेमचंद जी का पहला कहानी संग्रह सोज़े वतन था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने जप्त कर लिया था।

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कुछ कहानियों के नाम

  • अन्धेर
  • अनाथ लड़की
  • अपनी करनी
  • अमृत
  • अलग्योझा
  • आख़िरी तोहफ़ा
  • आखिरी मंजिल
  • आत्म-संगीत
  • आत्माराम
  • दो बैल की कथा
  • आल्हा
  • इज्जत का खून
  • इस्तीफा
  • ईदगाह
  • ईश्वरीय न्याय
  • उद्धार
  • एक ऑंच की कसर
  • एक्ट्रेस
  • कप्तान साहब
  • कर्मों का फल
  • क्रिकेट मैच
  • कवच
  • क़ातिल
  • कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला
  • कौशल़
  • खुदी
  • गैरत की कटार
  • गुल्‍ली डण्डा
  • घमण्ड का पुतला
  • ज्‍योति
  • जेल
  • जुलूस
  • झांकी
  • ठाकुर का कुआं
  • तेंतर
  • त्रिया-चरित्र
  • तांगेवाले की बड़
  • तिरसूल
  • दण्ड
  • दुर्गा का मन्दिर
  • देवी
  • देवी – एक और कहानी
  • दूसरी शादी
  • दिल की रानी
  • दो सखियाँ
  • धिक्कार
  • धिक्कार – एक और कहानी
  • नेउर
  • नेकी
  • नब़ी का नीति-निर्वाह
  • नरक का मार्ग
  • नैराश्य
  • नैराश्य लीला
  • नशा
  • नसीहतों का दफ्तर
  • नाग-पूजा
  • नादान दोस्त
  • निर्वासन
  • पंच परमेश्वर
  • पत्नी से पति
  • पुत्र-प्रेम
  • पैपुजी
  • प्रतिशोध
  • प्रेम-सूत्र
  • पर्वत-यात्रा
  • प्रायश्चित
  • परीक्षा
  • पूस की रात
  • बैंक का दिवाला
  • बेटोंवाली विधवा
  • बड़े घर की बेटी
  • बड़े बाबू
  • बड़े भाई साहब
  • बन्द दरवाजा
  • बाँका जमींदार
  • बोहनी
  • मैकू
  •  मन्त्र
  • मन्दिर और मस्जिद
  • मनावन
  • मुबारक बीमारी
  • ममता
  • माँ
  • माता का ह्रदय
  • मिलाप
  • मोटेराम जी शास्त्री
  • र्स्वग की देवी
  • राजहठ
  • राष्ट्र का सेवक
  • लैला
  • वफ़ा का ख़जर
  • वासना की कड़ियॉँ
  • विजय
  • विश्वास
  • शंखनाद
  • शूद्र
  • शराब की दुकान
  • शान्ति
  • शादी की वजह
  • शान्ति
  • स्त्री और पुरूष
  • स्वर्ग की देवी
  • स्वांग
  • सभ्यता का रहस्य
  • समर यात्रा
  • समस्या
  • सैलानी बन्दर
  • स्‍वामिनी
  • सिर्फ एक आवाज
  • सोहाग का शव
  • सौत
  • होली की छुट्टी
  • नम क का दरोगा
  • गृह-दाह
  • सवा सेर गेहुँ नमक कादरोगा
  • दुध का दाम
  • मुक्तिधन
  • कफ़न

प्रेमचंद की प्रमुख कहानियाँ:- “बड़े घर की बेटी, रानी सारन्धा, नमक का दरोगा, सौत, आभूषण, प्रायश्चित, कामना, मन्दिर और मसजिद, घासवाली, महातीर्थ, सत्याग्रह, लांछन, लैला और मन्त्र” है

Munshi premchand ke upanyas

  • गोदान 
  • गबन 
  • निर्मला 
  • प्रेमा 
  • रंगभूमि 
  • कर्मभूमि
  • वरदान 
  • प्रतिज्ञा 
  • अलंकार 
  • दुर्गादास 
  • मंगलसूत्र (अपूर्ण)
  • हमखुर्मा व हमसवाब 
  • रामचर्चा 
  • सेवासदन 
  • प्रेमाश्रम 
  • रूठी रानी 
  • शेख सादी

मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख उपन्यास 

सेवासदन , प्रेमाश्रम , रंगभूमि , निर्मला , कायाकल्प , गबन , कर्मभूमि , गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण) हैं 

Movies/TV serials based on premchand works (प्रेमचंद की कितनी रचनाओं पर फ़िल्म बनी है?)

हिंदी सिनेमा की बात करें तो Munshi Premchand की रचनाएँ फिल्म निर्माताओं के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रही हैं। उनकी कहानियों की गहराई और सामाजिक यथार्थ ने उन्हें फिल्म जगत में भी अत्यंत लोकप्रिय बना दिया।

प्रसिद्ध निर्देशक Satyajit Ray ने प्रेमचंद की रचनाओं पर यादगार फिल्में बनाई। उन्होंने 1977 में Shatranj Ke Khiladi और 1981 में Sadgati का निर्माण किया, जिन्हें आज भी क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है।

प्रेमचंद के निधन के दो वर्ष बाद, 1938 में निर्देशक K. Subramanyam ने उनके उपन्यास Sevasadan पर फिल्म बनाई, जिसमें M. S. Subbulakshmi ने मुख्य भूमिका निभाई।

इसी तरह, Mrinal Sen ने 1977 में प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी Kafan पर आधारित तेलुगू फिल्म Oka Oori Katha बनाई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

इसके अलावा, 1963 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास Godaan पर फिल्म बनाई गई। 1966 में Gaban पर भी फिल्म बनी, और 1980 में Nirmala पर एक लोकप्रिय टीवी धारावाहिक तैयार किया गया।

इस प्रकार Munshi Premchand की रचनाओं ने केवल साहित्य बल्कि सिनेमा और टेलीविजन जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

Munshi premchand - Mansarovar

मानसरोवर (कथा संग्रह) प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानियों का संकलन है। उनके मृत्यु के बाद मानसरोवर नाम से 8 खण्ड प्रकाशित किए गए। इस संकलन में उनकी दो सौ से भी अधिक कहानियों को शामिल किया गया है। 

Premchand ki Pramukh (best) rachnaye

पूस की रात, गोदान, बड़े घर की बेटी, निर्मला, पंच परमेश्वर, रंगभूमि, प्रतिज्ञा, सेवा सदन, काया कल्प, दुर्गा दास, दीपदान (एकांकी), प्रेमाश्रम, गबन, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा और कफन

Munshi premchand ki Godan

गोदान प्रेमचन्द द्वारा लिखी गई अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है। कुछ लोग गोदान को सर्वोत्तम रचना भी मानते हैं। 1936 में इसे हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसमें भारतीय ग्रामीण समाज एवं परिवेश का सजीव चित्रण किया गया है।

Munshi premchand bade ghar ki beti

 बड़े घर की बेटी में प्रेमचंद जी ने संयुक्त (joint) परिवारों में होने वाले झगड़ो, समस्याओं और जरा जरा सी बातों के बतंगड बन जाने को बहुत ही सुंदरता से दर्शाया है।

Munshi premchand - Nirmala

 मुंशी प्रेमचन्द द्वारा रचित प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यास में से एक निर्मला भी है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी दहेज प्रथा और अनमेल विवाह के आधार पर बड़े सुंदरता से दर्शाया है। जिस समय दहेज़ प्रथा के विपक्ष कोई आवाज भी नहीं उठता था। 

munshi premchand ki bhasha shaili

मुंशी प्रेमचंद जी उर्दू से हिन्दी में आए थे; अत: उनकी भाषा में उर्दू की चुस्त लोकोक्तियों तथा मुहावरों के प्रयोग की प्रचुरता मिलती है। इससे उनकी सभी रचनाएं और भी दिलचस्प हो जाती है।

मुंशी प्रेमचंद भाषा सहज, सरल, व्यावहारिक, प्रवाहपूर्ण, मुहावरेदार एवं प्रभावशाली है तथा उसमें अद्भुत व्यंजनाशक्ति भी विद्यमान है।

munshi premchand awards

प्रेमचंद पुरस्कार महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी (academy) की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय (notable) कार्य करने वाले साहित्यकार को दिया जाता है। पुरस्कार में 25,000, रुपये नकद, स्मृति चिह्न, शॉल और श्रीफल प्रदान दिए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भी एक साहित्य पुरस्कारप्रेमचंद स्मृति पुरस्कारनाम से प्रदान किया जाता है।

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