सितारा देवी, एक प्रसिद्ध शास्त्रीय कथक नृत्यांगना, अभिनेत्री और गायिका: Introduction of Sitara Devi

Sitara Devi भारत की एक प्रसिद्ध शास्त्रीय कथक नृत्यांगना, अभिनेत्री और गायिका थीं। उनका जन्म 8 नवंबर 1920 को Kolkata में दीपावली के दिन हुआ था।

चूंकि उनका जन्म Diwali के पावन अवसर पर हुआ था, इसलिए उनका नाम धनलक्ष्मी रखा गया, और उन्हें प्यार सेधन्नोभी कहा जाता था।

Early life of Sitara Devi (प्रारंभिक जीवन)

Sitara Devi का जन्म Varanasi के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता Sukhdev Maharaj प्रसिद्ध कथक कलाकार और शिक्षक थे, जबकि उनकी माता मत्स्य कुमारी नेपाल के शाही परिवार से संबंध रखती थीं।

कथक नृत्य उनके परिवार के लिए केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि एक परंपरा और जुनून भी था। Sukhdev Maharaj ने अपनी संपूर्ण कलाकथक, भरतनाट्यशास्त्र और संस्कृत का ज्ञानअपने बच्चों को सिखाया। सितारा देवी की बहनों के नाम अलकनंदा, तारा और धन्नो थे, जबकि उनके भाइयों के नाम चौबे और पांडे थे।

Sitara Devi ने अपने पिता से ही नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता ने बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए एक नृत्य विद्यालय भी स्थापित किया था। उनकी नृत्य शैली में Banaras Gharana और Lucknow Gharana दोनों घरानों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो Sitara Devi ने चार विवाह किए। उनके पहले पति श्री देसाई थे, जिनके बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके दूसरे पति Nazir Ahmed Khan थे, जिनसे उनकी आयु में लगभग 16 वर्ष का अंतर था।

इसके बाद उनकी तीसरी शादी फिल्म निर्माता K. Asif से हुई, जो उनके दूसरे पति के चचेरे भाई थे, लेकिन यह विवाह भी अधिक समय तक नहीं चला। अंततः उन्होंने गुजराती मूल के प्रताप बरोट से विवाह किया, जिनसे उनके पुत्र Ranjit Barot का जन्म हुआ।

इस प्रकार Sitara Devi का जीवन कला, परंपरा और व्यक्तिगत अनुभवों का एक अनोखा संगम रहा।

Career (करियर)

Sitara Devi ने अपने नृत्य करियर की शुरुआत Jehangir Hall में पहले प्रदर्शन से की। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन्हें फिल्म निर्माता और नृत्य निर्देशक Niranjan Sharma ने हिंदी फिल्मों में नृत्य दृश्यों के लिए चुन लिया।

उन्होंने Usha Haran, Watan, Nagina, Roti, Mother India और Anjali जैसी फिल्मों में कथक नृत्य प्रस्तुत किया। 1930 के दशक से ही वे कथक की कोरियोग्राफर के रूप में सक्रिय रहीं और उनकी कोरियोग्राफी ने फिल्म इंडस्ट्री को एक नई दिशा दी।

महान कवि Rabindranath Tagore ने उन्हें मात्र 16 वर्ष की उम्र मेंनृत्य सम्राज्ञीकी उपाधि दी। उन्होंने Sitara Devi को कथक के माध्यम से भारतीय कला को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित भी किया। इसी कारण उन्हेंकथक की रानीके रूप में जाना जाता है।

उन्होंने भारत के साथसाथ विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। 1967 में Royal Albert Hall और 1976 में Carnegie Hall जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी।

उस समय समाज में नृत्य करने वालों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, जिसके कारण Sitara Devi और उनके परिवार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। बाद में उनका परिवार Mumbai आकर बस गया, जब वे लगभग 11 वर्ष की थीं।

मुंबई में उन्होंने Sarojini Naidu, Rabindranath Tagore और Cowasji Jehangir जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में Atiya Begum Palace में कथक प्रस्तुत किया।

Rabindranath Tagore उनके नृत्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें Tata Group के टाटा पैलेस में प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया। इस प्रस्तुति के बाद उन्हें सम्मानस्वरूप एक शॉल और एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया गया।

इस प्रकार Sitara Devi ने अपने अद्वितीय प्रतिभा और संघर्ष के बल पर भारतीय शास्त्रीय नृत्य को देशविदेश में नई पहचान दिलाई।

Awards (पुरस्कार)

  • उन्हें 1969 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया गया।
  • 1973 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • 1995 में कालिदास सम्मान पुरस्कार और नृत्य निपुण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें 1943 में फिल्म ‘वतन’ और ‘नजम’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।
  • उन्हें 1967 में रॉयल अल्बर्ट और विक्टोरिया हॉल में प्रदर्शन के लिए और 1976 में प्रतिष्ठित कार्नेगी हॉल, न्यूयॉर्क के लिए सम्मानित किया गया।
  • उन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है

अन्य जानकारी

सितारा देवी का 25 नवंबर 2014 को मंगलवार को अस्पताल में 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

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